आसमान अपना-अपना

अमरदीप जौली

चट्टान की नुकीली ढलान पर बाज चुपचाप बैठा था। एक पंख लहूलुहान था, हवा का एक तेज़ झोंका भी उसके जिस्म में दर्द की लहर दौड़ा जाता था। उसकी आँखें नीचे घाटी की तरफ़ नहीं, बल्कि बादलों के उस पार टिकी थीं जहाँ कभी वह तूफानों को चीरते हुए रास्ता बनाया करता था।तभी पास की झाड़ी से फुदकती हुई एक छोटी चिड़िया आई। उसने बाज के टूटे परों और उसकी बेबसी को देखा, तो उसे लगा कि शायद यह विशाल परिंदा उड़ना ही भूल गया है।चिड़िया ने अपनी छाती फुलाई, एक छोटी सी डाली पर छलांग लगाई और बोली, “सुनो भाई, पंखों को ऐसे धीरे-धीरे फड़फड़ाओ। ज़मीन के करीब रहो ताकि हवा का डर न रहे। दो बार इधर झूलो, एक बार उधर, और बस… उड़ना तो बेहद आसान है। तुम यूँ चुपचाप क्यों बैठे हो? देखो, ऐसे उड़ान भरी जाती है!”चिड़िया अपनी समझ से सच्ची थी। उसका पूरा संसार तिनकों, झाड़ियों और बगीचों तक सीमित था। उसने कभी शून्य का सन्नाटा नहीं देखा था, न ही उस ऊँचाई को महसूस किया था जहाँ साँस लेना भी भारी हो जाता है।बाज ने अपनी भारी, तीखी पलकें उठाईं और बेहद शांत नज़रों से उस नन्ही चिड़िया को देखा। उसके चेहरे पर न क्रोध था, न उपहास—सिर्फ़ एक गहरी, आत्मज्ञानी खामोशी थी।बाज ने धीमी लेकिन गूँजती हुई आवाज़ में कहा, “चिड़िया, तुम मुझे उड़ना नहीं सिखा रहीं, तुम मुझे सिर्फ़ ‘बचना’ सिखा रही हो। तुम्हारा आसमान ज़मीन से जुड़ा है, और मेरा आसमान तूफानों से शुरू होता है। मेरा पंख टूटा है, मेरा हौसला नहीं। जिस दिन यह ज़ख्म भरेगा, उस दिन उड़ान किसी डाली से दूसरी डाली तक की नहीं होगी, बल्कि फिर से उसी अनंत की होगी जहाँ सिर्फ़ खामोशी और बादलों का राज होता है।”चिड़िया सहमकर चुप हो गई। उसे समझ आ गया कि घायल शेर शिकार करना नहीं भूलता, और ज़ख्मी बाज की ख़ामोशी भी किसी सामान्य उड़ान से कहीं ऊँची होती है। कुछ लोगों की चुप्पी उनकी हार नहीं, बल्कि अगली बड़ी छलांग की तैयारी होती है।

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