कपालभाती षट्कर्म – शरीर की आंतरिक शुद्धि(Detoxification) की सर्वश्रेष्ठ क्रिया

डॉ. भूमेश योगी

कपालभाती मुख्य रूप से एक शुद्धी क्रिया है। कपालभाती तीन प्रकार की होती है। वातक्रम, शीतक्रम व व्युत्क्रम। वातक्रम कपालभाती श्वास आधारित क्रिया है। शीतक्रम व व्युत्क्रम  जल आधारित क्रिया है। इसलिए यहाँ हम केवल वातक्रम कपालभाती पर ही बात करेंगे। वातक्रम कपालभाती श्वास आधारित होने के कारण आधुनिक समय के कुछ योग विद्वान इसे प्राणायाम के रूप में भी मानते हैं लेकिन हठयोग में इसे एक प्रमुख शुद्धी क्रिया कहा गया है। आधुनिक शोधों के आधार पर कपालभाती को विभिन्न बीमारीयों को दूर करने वाले योगिक अभ्यास के रूप में देखा गया है। ऐसे रोगियों को देखा गया है जो बिना बैसाखी के चल नहीं पाते थे लेकिन नियमित कपालभाती करने के बाद उनकी बैसाखी छूट गई और वे सहज चलने-फिरने लग गए।

कपालभाती प्राणायाम की अभ्यास विधि

कपालभाती हठयोग की एक प्रमुख शुद्धिकरण क्रिया है, जिसे सामान्यतः प्राणायाम के अभ्यासों में भी शामिल किया जाता है। इसमें पेट की मांसपेशियों को सक्रिय करते हुए नाक से तेज, लयबद्ध और जोरदार श्वास बाहर छोड़ी जाती है, जबकि श्वास भीतर लेना सहज और निष्क्रिय रूप से होता है।

1. अभ्यास की तैयारी

  • प्रातः खाली पेट या भोजन के कम-से-कम 3–4 घंटे बाद अभ्यास करें।
  • शांत, स्वच्छ और हवादार स्थान चुनें।
  • सुखासन, पद्मासन, सिद्धासन या वज्रासन में बैठें।
  • रीढ़, गर्दन और सिर को सीधा रखें।
  • दोनों हाथों को घुटनों पर ज्ञान मुद्रा या आरामदायक स्थिति में रखें।
  • आँखें बंद करके शरीर को शिथिल करें।
  • आरामदायक ध्यानात्मक आसन में बैठकर रीढ़ को सीधा रखें। कंधों और चेहरे को तनावमुक्त रखें।

2. अभ्यास क्रम

  • जोर से श्वास बाहर छोड़ें:  पेट की मांसपेशियों को तेजी से अंदर की ओर संकुचित करें और नासिका से छोटी, तीव्र एवं नियंत्रित श्वास बाहर निकालें। श्वास छोड़ते समय पेट अंदर की ओर जाएगा।
  • श्वास को सहज रूप से अंदर आने दें:  पेट को ढीला छोड़ दें। इससे फेफड़ों में हवा अपने आप प्रवेश करेगी। अंदर श्वास भरने के लिए जोर न लगाएँ।
  • लयबद्ध अभ्यास करें: इसी प्रकार पेट को संकुचित करके श्वास बाहर छोड़ें और पेट को ढीला छोड़कर श्वास अंदर आने दें। अभ्यास के बाद सामान्य श्वास लेते हुए विश्राम करें।

3. अभ्यास की गति और अवधि

अभ्यास स्तर              प्रति चक्र                        चक्रों की संख्या

प्रारंभिक                      20 श्वास                          2 चक्र

मध्यम                                    50 श्वास                          3 चक्र

अभ्यस्त साधक             100 श्वास                                    3 चक्र

  • प्रत्येक चक्र के बाद लगभग 30 सेकंड सामान्य श्वास लेते हुए विश्राम करें।
  • शुरुआत में धीमी गति और हल्के बल का प्रयोग करें।
  • अभ्यास के दौरान श्वास रोकना आवश्यक नहीं है।
  • गति से अधिक सही तकनीक, सहजता और नियंत्रण को प्राथमिकता दें।

4. कपालभाती में श्वसन की लय

एक श्वसन चक्र

  • रेचक- सक्रिय – जोर से श्वास बाहर
  • पूरक- निष्क्रिय – श्वास सहज अंदर

मुख्य क्रिया: पेट का तीव्र संकुचन करके श्वास बाहर निकालना।

5. कपालभाती के लाभ:

कपालभाति के नियमित और उचित विधि से अभ्यास के कई विशेष लाभ हैं :

  1. कपालभाती करने वाला साधक आत्मनिर्भर और स्वयंपूर्ण हो जाता है, कपालभाती से हृदय के ब्लॉकेजेस् पहले ही दिन से खुलने लगते हैं और इसके साथ ही शरीर में कहीं भी ब्लॉकेजेस् हो वह धीरे –धीरे खुलने लग जाती है।
  2.  कपालभाती करने वालों की हृदय की कार्यक्षमता बढ़ती है, जबकि हृदय की कार्यक्षमता बढ़ाने वाली कोई भी दवा उपलब्ध नहीं है।
  3.  कपालभाती करने वालों का हृदय कभी भी अचानक काम करना बंद नहीं करता, जबकि आजकल बड़ी संख्या में लोग अचानक हृदय बंद(Heart Attack) होने से जीवन समाप्त हो जाते हैं ।
  4.  कपालभाती करने से शरीरांतर्गत और शरीर के ऊपर की किसी भी तरह की गाँठ गल जाती है, क्योंकि कपालभाती से शरीर में जबर्दस्त उर्जा निर्माण होती है जो गाँठ को धीरे धीरे कम करते हुए समाप्त कर देती है। फिर वह गाँठ चाहे ब्रेस्ट की हो अथवा अन्य कही की। ब्रेन ट्यूमर हो अथवा ओव्हरी की सिस्ट हो या यूटेरस के अंदर फाइब्रॉईड हो, क्योंकि सबके नाम भले ही अलग हो लेकिन गाँठ बनने की प्रक्रिया एक ही होती है।
  5.  कपालभाती से बढा हुआ कोलेस्टेरोल कम होता है।विशेष बात यह है कि कपालभाती का अभ्यास प्रारम्भ करने के प्रथम दिन से ही मरीज की कोलेस्टेरॉल नियंत्रित होने लगता है।
  6.  कपालभाती से बढा हुआ इएसआर, युरिक एसिड, एसजीओ, एसजीपीटी, क्रिएटिनाईन, टीएसएच, हार्मोन्स, प्रोलेक्टीन आदि सामान्य स्तर पर आ जाते है।
  7.  कपालभाती करने से हिमोग्लोबिन एक महीने में 12 तक पहुँच जाता है। कपालभाती से हीमोग्लोबिन एक वर्ष में 16 से 18 तक हो जाता है। महिलाओं में हिमोग्लोबिन 16 और पुरुषों में 18 होना उत्तम माना जाता है।
  8.  कपालभाती से महिलाओं के मासिक धर्म की सभी शिकायतें एक महीने में सामान्य हो जाती है । ध्यान देने योग्य बात यह है कि महिलायों को कपालभाती का अभ्यास मासिक धर्म प्रारम्भ होने से पाँच दिन तक नहीं करना है।
  9.  कपालभाती से अनियंत्रित थायरॉईड एक महीने में सुधार आना प्रारम्भ हो जाता है। इसकी दवाइयाँ भी अभ्यास प्रारम्भ होने से धीरे- धीरे कम की जा सकती है।
  10. इतना ही नही बल्कि कपालभाती करने वाला साधक 5 मिनिट में मन के परे पहुँच जाता है। गुड़ हार्मोन्स(डोपामाइन) का सीक्रेशन होने लगता है। स्ट्रेस हार्मोन्स(कार्टिसोल) कम हो जाता है, मानसिक व शारीरिक थकान नष्ट हो जाती है। इससे मन की एकाग्रता भी बढ़ती है।
  11. कपालभाती से खून में प्लेटलेट्स बढ़ते हैं। व्हाइट ब्लड सेल्स या रेड ब्लड सेल्स यदि कम या अधिक हुए हो तो वे निर्धारित मात्रा में आकर संतुलित हो जाते हैं। कपालभाती से सभी कुछ संतुलित हो जाता है, ना तो कोई अंडरवेट रहता है, ना ही कोई ओव्हरवेट रहता है। अंडरवेट या ओव्हरवेट होना दोनों ही बीमारियाँ है।
  12. कपालभाती से कोलायटीस, अल्सरीटिव्ह कोलायटीस, अपच, मंदाग्नी, संग्रहणी, जीर्ण संग्रहणी, आँव जैसी बीमारियाँ ठीक होती है। काँस्टीपेशन, गैसेस, एसिडिटी भी ठीक हो जाती है। पेट की बीमारियाँ ठीक हो जाती है ।
  13. कपालभाती से सफेद दाग(Vitiligo), सोरायसिस, एक्झिमा, ल्युकोडर्मा, स्कियोडर्मा जैसे त्वचारोग ठीक होते हैं। स्कियोडर्मा पर कोई दवाई उपलब्ध नही है लेकिन यह कपालभाती से ठीक हो जाता है। अधिकतर त्वचा रोग, पेट की खराबी से होते है, जैसे जैसे पेट ठीक होता है ये रोग भी ठीक होने लगते हैं।
  14. कपालभाती से छोटी आँत को शक्ति प्राप्त होती है जिससे पाचन क्रिया सुधर जाती है। पाचन ठीक होने से शरीर को कैल्शियम, मैग्नेशियम, फॉस्फरस, प्रोटीन्स इत्यादि उपलब्ध होने से कुशन्स, लिगैमेंट्स, हड्डियाँ ठीक होने लगती हैं और 3 से 9 महिनों में अर्थ्राइटीस, एस्ट्रो अर्थ्राइटीस, एस्ट्रो पोरोसिस जैसे हड्डियों के रोग हमेशा के लिए ठीक हो जाते हैं।
  15. कैल्शियम, प्रोटीन्स, हिमोग्लोबिन, व्हिटैमिन्स आदि को शरीर बिना पचाए बाहर निकाल देता है क्योंकि केमिकल्स से बनाई हुई इस प्रकार की औषधियों को शरीर द्वारा सोखे जाने की प्रक्रिया हमारे शरीर के प्रकृति में ही नही है। हमारे शरीर में रोज 10 % बोनमास चेंज होता रहता है, यह प्रक्रिया जन्म से मृत्यु तक निरंतर चलती रहती है अगर किसी कारणवश यह बंद हुई, तो हड्डियों के विकार हो जाते हैं। कपालभाती इस प्रक्रिया को निरंतर चालू रखती है इसीलिए कपालभाती नियमित रूप से करना आवश्यक है। कपालभाती क्रिया कितनी लाभकारी है इसीलिए नियमित रूप से कपालभाति करना एक उत्तम योगिक प्रक्रिया है।
  16. श्वसन की जागरूकता तथा पेट की मांसपेशियों के नियंत्रण में सहायता कर सकता है।
  17. ध्यान और मानसिक एकाग्रता के अभ्यास की तैयारी में उपयोगी हो सकता है।
  18. योग की पारंपरिक दृष्टि से शुद्धिकरण क्रिया के रूप में वर्णित है।
  19. दर क्षेत्र में सक्रियता और श्वसन-लय के समन्वय को बढ़ावा देता है।
  20. कपालभाती श्वास के साथ- साथ शारीरिक स्टेमिना बढ़ती है।

6. सावधानियाँ

कपालभाती में तेज और जोर से श्वास-त्याग होता है, इसलिए इसे सावधानीपूर्वक करना चाहिए।

  • गर्भावस्था में इसका अभ्यास न करें।
  • अनियंत्रित उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, हाल की सर्जरी, हर्निया या गंभीर श्वसन समस्या वाले व्यक्ति चिकित्सकीय सलाह के बिना इसका अभ्यास न करें।
  • चक्कर, सिरदर्द, सीने में दर्द, सांस फूलना या असहजता होने पर तुरंत अभ्यास रोक दें।
  • शुरुआती साधक प्रशिक्षित योग विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में अभ्यास करें।
  • अत्यधिक तेज गति, जोर लगाना और लंबे समय तक श्वास रोकना न करें।

निष्कर्ष: कपालभाती में सक्रिय एवं तीव्र रेचक तथा सहज पूरक का समन्वय होता है। सही आसन, नियंत्रित गति, पेट की उचित गति और नियमित विश्राम इसके सुरक्षित अभ्यास के मुख्य आधार हैं।

नोट: अत: योग चिकित्सक या योग शिक्षक या योग विशेषयज्ञ को अपना examination व शारीरिक रक्त आदि की जांच कराके अच्छे प्रकार से सीखकर, कितना अभ्यास, कब करना चाहिए आदि बातों को ध्यान रख करके अभ्यास कारण चाहिए।

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