✍️दीपक कुमार द्विवेदी
आज सुबह मुझे एक व्हाट्सएप संदेश मिला। भेजने वाले कोई सामान्य व्यक्ति नहीं, बल्कि रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी हैं गंभीर, पढ़े-लिखे और जीवन को गहराई से देखने वाले। उन्होंने एक लंबा लेख भेजा था, जिसमें लिखा था“आने वाला समय कुंवारेपन का युग होगा।”
संदेश पढ़कर मैं कुछ देर तक स्क्रीन देखता रह गया। यह कोई सनसनीखेज लाइन नहीं थी, बल्कि एक चेतावनी जैसी लगी। कारण यह था कि जो बातें उस लेख में लिखी थीं, वे मेरे लिए नई नहीं थीं मैं उन्हें अपने आसपास होते हुए देख रहा हूँ। शायद इसी कारण वह संदेश भीतर तक उतर गया, जैसे किसी ने मन के भीतर दबे सवालों को शब्द दे दिए हों।
मैं गाँव की पृष्ठभूमि से आता हूँ। बचपन में दादा-दादी, नानी से जो कहानियाँ सुनीं, उनमें विवाह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि जीवन की धुरी हुआ करता था। वे बताते थे कि कैसे कम उम्र में विवाह हो जाता था, कैसे पूरा परिवार साथ रहता था, कैसे सुख-दुख साझा होते थे। मेरे अपने पिता और चाचा का विवाह 13 से 15 वर्ष की उम्र में हुआ था। आज यह बात अविश्वसनीय लगती है, लेकिन तब यह जीवन का सामान्य क्रम था।
अब वर्तमान को देखता हूँ तो तस्वीर बिल्कुल अलग है। आज 30–35 वर्ष तक विवाह नहीं हो रहा। लड़कियाँ भी 32–35 की उम्र के बाद विवाह कर रही हैं, कई तो उससे भी आगे। मेरे अपने अनुभव में ऐसी अनगिनत कहानियाँ हैं।
मैं जब पढ़ाई के लिए शहर में किराये के कमरे में रहता था, तो उसी मकान में एक परिवार और रहता था। उनकी बेटी करीब 35 वर्ष की थी सॉफ्टवेयर इंजीनियर, कुछ साल अमेरिका में काम कर चुकी, हर तरह से सक्षम। लेकिन विवाह की बात आते ही साफ मना कर देती थी। उसकी माँ को रोज़ देखता था कभी पूजा-पाठ, कभी पंडित से बात, कभी रिश्तों की तलाश। कई प्रस्ताव आए, लेकिन हर बार कोई न कोई कारण“अभी नहीं”, “यह सही नहीं”, “और बेहतर मिल जाएगा” और बात खत्म।
यह एक घर की कहानी नहीं थी। मेरे आसपास ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं। कॉलेज के दोस्त, जान-पहचान के लोग कोई 30 पार, कोई 35 के करीब और विवाह अभी भी “सोच रहे हैं” की स्थिति में।
यह एक घर की कहानी नहीं थी। सच कहूँ तो अब तो लगता है कि यह अपवाद नहीं, बल्कि नई सामान्य स्थिति बनती जा रही है। मेरे आसपास ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं—कॉलेज के दोस्त, कोचिंग के साथी, जान-पहचान के लोग कोई 30 पार कर चुका है, कोई 35 के करीब है, लेकिन विवाह अभी भी “देखेंगे”, “सोच रहे हैं”, “अभी टाइम है” जैसे शब्दों में अटका हुआ है। पहले जहाँ 25 के बाद अविवाहित रह जाना असामान्य माना जाता था, आज वही उम्र “जल्दी क्या है” वाली सोच में बदल गई है। यह बदलाव इतना व्यापक है कि अब यह केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं लगता, बल्कि एक सामूहिक मानसिकता बन चुका है।
अब सवाल यही उठता है कि क्या यह सब केवल व्यक्तिगत चुनाव है? क्या सच में हर व्यक्ति अपने स्तर पर यही निर्णय ले रहा है, या फिर इसके पीछे कोई बड़ी प्रवृत्ति काम कर रही है, जो धीरे-धीरे हमारी सोच को दिशा दे रही है? अगर हम पिछले 10–15 वर्षों को ध्यान से देखें, तो एक पैटर्न साफ दिखाई देता है। फिल्मों, वेब सीरीज़ और सोशल मीडिया ने रिश्तों को देखने का नजरिया बदल दिया है। लगभग हर जगह एक ही बात बार-बार दोहराई जाती है—“अपनी जिंदगी अपने तरीके से जियो”, “किसी बंधन में मत बंधो”, “कमिटमेंट से दूर रहो”, “विवाह पुरानी सोच है”। परिवार को कई बार ऐसे दिखाया जाता है जैसे वह व्यक्ति की स्वतंत्रता को रोकने वाला ढाँचा हो पितृसत्तात्मक, दबाव बनाने वाला, और प्रगति के रास्ते में बाधा।
धीरे-धीरे यह सब केवल मनोरंजन नहीं रह जाता, बल्कि सोच का हिस्सा बन जाता है। जब एक ही तरह का संदेश बार-बार अलग-अलग माध्यमों से मिलता है, तो वह सामान्य लगने लगता है। यही हुआ है। आज कई युवाओं के लिए विवाह “जरूरी” नहीं, बल्कि “ऑप्शनल” हो गया है। रिश्ते स्थायित्व के बजाय “कंफर्ट” और “कन्वीनियंस” पर टिके हुए दिखाई देते हैं।
इसके साथ ही एक और पक्ष है, जिस पर हम कम ध्यान देते हैं बाज़ार का। आज का वैश्विक बाजार व्यक्ति को एक उपभोक्ता के रूप में देखता है, परिवार के हिस्से के रूप में नहीं। एक व्यक्ति अकेला रहेगा तो उसकी जरूरतें अलग-अलग होंगी अलग घर, अलग फर्नीचर, अलग गाड़ी, अलग खर्च। एक परिवार जहाँ एक ही संसाधन को कई लोग साझा करते हैं, वहीं अकेले रहने पर हर चीज़ कई गुना बढ़ जाती है। यही कारण है कि शहरों में सिंगल लिविंग, स्टूडियो अपार्टमेंट, व्यक्तिगत लाइफस्टाइल प्रोडक्ट्स तेजी से बढ़ रहे हैं।
सीधी भाषा में कहें तो अकेला व्यक्ति बाजार के लिए ज्यादा “लाभकारी” होता है। इसलिए ऐसी जीवनशैली को बढ़ावा मिलना स्वाभाविक है, जहाँ व्यक्ति स्वतंत्र तो दिखता है, लेकिन वास्तव में वह पूरी तरह बाजार पर निर्भर हो जाता है। परिवार जितना मजबूत होगा, बाजार की पकड़ उतनी कम होगी; और परिवार जितना कमजोर होगा, व्यक्ति उतना ही अकेला और उपभोग के लिए तैयार होगा।
यही वह सूक्ष्म परिवर्तन है, जिसे हम रोज़ देख तो रहे हैं, लेकिन समझने की कोशिश कम कर रहे हैं।
यह सब सुनने में सैद्धांतिक लग सकता है, लेकिन इसके परिणाम अब ज़मीन पर साफ दिखाई देने लगे हैं, और केवल अनुभव ही नहीं, आँकड़े भी उसी दिशा की ओर इशारा कर रहे हैं।
भारत में कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate) वर्ष 2000 में लगभग 3.2 थी, जो घटकर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019–21) के अनुसार 2.0 रह गई है। यह स्तर 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से भी नीचे है। इसका सीधा अर्थ है कि आने वाले वर्षों में जनसंख्या का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ सकता है और नई पीढ़ियों की संख्या घटती जाएगी। दक्षिण भारत के कई राज्यों केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक—में यह दर पहले ही 1.6–1.8 तक पहुँच चुकी है।
इसी के साथ विवाह की औसत आयु लगातार बढ़ रही है। NFHS-5 के अनुसार महिलाओं की औसत विवाह आयु 22.1 वर्ष हो चुकी है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 25–27 वर्ष तक पहुँच रही है। पुरुषों में कई महानगरों जैसे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु में पहली शादी की औसत आयु 29–31 वर्ष के बीच दर्ज की जा रही है। निजी सर्वेक्षणों में तो 35 वर्ष तक अविवाहित रहने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ती दिखाई देती है।
देर से विवाह होने का पहला और सीधा असर संतानोत्पत्ति पर पड़ता है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और विभिन्न स्त्रीरोग विशेषज्ञों के अनुसार 30 वर्ष के बाद महिलाओं की प्रजनन क्षमता में गिरावट शुरू हो जाती है और 35 के बाद यह तेज़ हो जाती है। यही कारण है कि भारत में IVF (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) और अन्य फर्टिलिटी उपचारों का बाज़ार तेजी से बढ़ा है। उद्योग रिपोर्ट्स के अनुसार भारत का फर्टिलिटी मार्केट 2023 तक लगभग 25,000 करोड़ रुपये के आसपास पहुँच चुका है और लगातार बढ़ रहा है। एक IVF चक्र का खर्च सामान्यतः 1.5 लाख से 3 लाख रुपये या उससे अधिक होता है, और कई दंपत्तियों को यह प्रक्रिया एक से अधिक बार करनी पड़ती है
यह केवल आर्थिक बोझ नहीं है, बल्कि मानसिक दबाव भी है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि संतान न होने की स्थिति वैवाहिक जीवन में तनाव का एक बड़ा कारण बनती है।
दूसरी बात, जब विवाह 30–35 वर्ष की आयु में होता है, तब तक व्यक्ति अपनी जीवनशैली, आदतों और सोच में पूरी तरह स्थापित हो चुका होता है। ऐसे में समायोजन कठिन हो जाता है। यही कारण है कि महानगरों में तलाक़ के मामलों में वृद्धि देखी जा रही है। भारत में कुल तलाक़ दर अभी भी 1% से कम बताई जाती है, लेकिन दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे शहरों में पारिवारिक न्यायालयों में मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार महानगरों में हर साल हजारों नए मामले दर्ज हो रहे हैं।
तीसरी और सबसे गंभीर बात—रिश्तों में विश्वास का संकट। आज मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने संपर्क के अनगिनत रास्ते खोल दिए हैं। एक अध्ययन (2018, Gleeden सर्वे) के अनुसार भारत के शहरी विवाहित लोगों में लगभग 50% तक ने किसी न किसी रूप में विवाहेतर आकर्षण या संबंध स्वीकार किया। यह आँकड़ा भले विवादित हो सकता है, लेकिन काउंसलिंग और फैमिली कोर्ट के मामलों में “तीसरे व्यक्ति” की भूमिका लगातार सामने आ रही है।
विवाह से पहले संबंधों की बढ़ती प्रवृत्ति भी एक सामाजिक यथार्थ बन चुकी है। विभिन्न युवा सर्वेक्षणों—जैसे India Today Youth Survey में यह सामने आया है कि शहरी युवाओं का एक बड़ा वर्ग विवाह से पहले रिश्तों को स्वीकार्य मानता है। इसका प्रभाव कई बार विवाह के बाद दिखाई देता है—तुलना, असंतोष और भावनात्मक दूरी के रूप में।
अब परिवार की संरचना को देखें। भारत की जनगणना और NSSO के आँकड़ों के अनुसार पिछले दो दशकों में औसत परिवार आकार (Household Size) घटकर लगभग 4.5 से 4 या उससे भी कम हो गया है। शहरी क्षेत्रों में यह और कम है। “सिंगल चाइल्ड” या “नो चाइल्ड” परिवारों की संख्या बढ़ रही है।
यदि यही प्रवृत्ति जारी रही, तो अगली पीढ़ी में रिश्तों का दायरा स्वतः सीमित हो जाएगा। चाचा, मामा, बुआ जैसे रिश्ते केवल शब्द बनकर रह जाएँगे ।
वृद्धावस्था की स्थिति भी इसी से जुड़ी हुई है। भारत में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या 2011 में लगभग 10 करोड़ थी, जो 2030 तक 18–20 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है। लेकिन उसी अनुपात में संयुक्त परिवार नहीं बढ़ रहे। इसका परिणाम यह है कि बुजुर्गों का एक बड़ा वर्ग अकेले जीवन जीने को मजबूर हो रहा है।
यह सब देखकर मन में बार-बार यही प्रश्न उठता है—क्या यह वही प्रगति है, जिसकी हम कल्पना कर रहे थे?
मैं यह नहीं कहता कि पहले सब कुछ आदर्श था। कम उम्र में विवाह के अपने सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी नुकसान भी थे। लेकिन आज जो स्थिति बन रही है, वह भी संतुलित नहीं कही जा सकती।
समस्या का मूल शायद यही है कि हमने संतुलन खो दिया है। हमने यह मान लिया है कि परिवार और विवाह प्रगति के विरोधी हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि वे जीवन को स्थिरता और आधार प्रदान करते हैं।
आज आवश्यकता किसी के विरोध में खड़े होने की नहीं, बल्कि समझदारी से सोचने की है।
विवाह को यदि केवल बोझ के रूप में देखा जाएगा, तो वह बोझ ही लगेगा। लेकिन यदि उसे साझेदारी, सहयोग और सहारे के रूप में समझा जाए, तो वही जीवन को दिशा देता है।
उस व्हाट्सएप संदेश ने मुझे इसलिए विचलित किया, क्योंकि उसमें लिखी हुई बात कोई कल्पना नहीं लगी—वह आज के बिखरे हुए दृश्यों को जोड़कर भविष्य का सीधा चित्र बना रही थी। जब अपने ही आसपास इतनी कहानियाँ दिखती हैं देर से होते विवाह, टलते निर्णय, अकेले होते घर, इलाज के भरोसे टिके परिवार तो समझ में आता है कि यह समस्या आने वाली नहीं है, यह शुरू हो चुकी है। फर्क बस इतना है कि हम अभी उसे “व्यक्तिगत चुनाव” कहकर नजरअंदाज़ कर रहे हैं।
अगर हम अभी भी नहीं समझे, तो आने वाले समय में स्थिति और स्पष्ट होगी संख्या के हिसाब से लोग होंगे, लेकिन पीढ़ियों का प्रवाह कमजोर होगा; घरों की संख्या बढ़ेगी, लेकिन उनमें बसने वाले परिवार कम होते जाएंगे; रिश्ते शब्दकोश में तो मिलेंगे, लेकिन जीवन में कम दिखाई देंगे। और तब शायद हमें यह एहसास होगा कि हमने सुविधा के बदले क्या खो दिया।
तब याद आएगी वही साधारण-सी बात, जो हमारे बुजुर्ग बिना किसी तर्क और आँकड़ों के कह जाते थे
“जीवन अकेले नहीं चलता।”




