जाति का नैरेटिव और हिंदू समाज का विस्मरण

अमरदीप जौली

✍️दीपक कुमार द्विवेदी

हिंदू समाज के विषय में आज जो सबसे अधिक भ्रम फैलाया गया है, वह “जाति” को उसकी मूल पहचान मान लेने का भ्रम है। ऐसा मान लिया गया है कि हिंदू समाज सदियों से जातियों में बँटा रहा है, वे जातियाँ आपस में संघर्ष करती रहीं और उसी संघर्ष का परिणाम आज की सामाजिक वास्तविकता है। यह धारणा जितनी प्रचलित है, उतनी ही ऐतिहासिक और शास्त्रीय तथ्यों से दूर है।
भारतीय परंपरा में समाज को समझने की भाषा जाति नहीं, बल्कि वर्ण, कुल, वंश, कुटुंब और समाज रही है। ये शब्द केवल सामाजिक पहचान नहीं बताते, बल्कि जीवन-व्यवस्था, उत्तरदायित्व और परस्पर निर्भरता को व्यक्त करते हैं। “वर्ण” का अर्थ कार्य और आचार से है, न कि जन्म से बने स्थायी वर्ग से। “कुल” और “वंश” पारिवारिक परंपरा और सांस्कृतिक निरंतरता को दर्शाते हैं। “कुटुंब” सामाजिक जीवन की इकाई है और “समाज” उस व्यापक संरचना का नाम है, जिसमें सभी परस्पर जुड़े हुए हैं।
शास्त्रों में “जाति” शब्द अवश्य मिलता है, किंतु उसका अर्थ आधुनिक “कास्ट” नहीं है। संस्कृत कोशों में जाति का अर्थ जन्म, उत्पत्ति या मानव-समूह बताया गया है। इसी कारण प्राचीन ग्रंथों में मानव जाति, आर्य जाति या हिंदू जाति जैसे प्रयोग मिलते हैं। यहाँ जाति का अर्थ सभ्यता या सांस्कृतिक समुदाय से है, न कि समाज के भीतर ऊँच-नीच से। यदि जाति का अर्थ वही होता जो आज समझा जा रहा है, तो शास्त्रों में उसके साथ अधिकार, निषेध और संघर्ष का विस्तृत विधान मिलता। ऐसा कहीं नहीं है।
वेदों और उपनिषदों में समाज का वर्णन वर्ण व्यवस्था के माध्यम से हुआ है। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में वर्णों का उल्लेख समाज के कार्यात्मक विभाजन के रूप में है। महाभारत में स्पष्ट कहा गया है कि कोई व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण या क्षत्रिय नहीं होता, वह कर्म से बनता है। यह कथन स्वयं इस बात का प्रमाण है कि भारतीय चिंतन जन्माधारित जातीय व्यवस्था को अंतिम सत्य नहीं मानता था।
व्यवहारिक जीवन में भी भारतीय समाज स्वयं को “समाज” के रूप में पहचानता रहा है। आज भी कहा जाता है—ब्राह्मण समाज, जाट समाज, गुर्जर समाज, बनिया समाज। इन नामों के साथ सामान्यतः “जाति” शब्द नहीं जुड़ता। इसका कारण यही है कि ये पहचानें सामाजिक इकाइयाँ हैं, न कि किसी संघर्ष की रेखाएँ। “सवर्ण” जैसा शब्द भी शास्त्रीय नहीं है; यह आधुनिक प्रशासनिक और राजनीतिक शब्द है, जो प्रतिक्रिया के रूप में गढ़ा गया।
इतिहास की दृष्टि से विदेशी यात्रियों के विवरण बहुत महत्वपूर्ण हैं। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने मौर्यकालीन भारत पर अपनी पुस्तक इंडिका लिखी। उसमें उसने भारतीय समाज का विस्तृत वर्णन किया—दार्शनिक, कृषक, सैनिक, कारीगर, व्यापारी—पर कहीं भी उसने समाज को जन्माधारित जातियों में बँटा हुआ नहीं बताया। उसने “कास्ट सिस्टम” जैसा कोई विचार प्रस्तुत नहीं किया। यही स्थिति चीनी यात्रियों फ़ाह्यान और ह्वेनसांग के वृत्तांतों में भी दिखती है। वे शिक्षा-संस्थानों, मठों, नगरों और सामाजिक जीवन का वर्णन करते हैं, पर जाति-संघर्ष का नहीं। यदि जाति भारतीय समाज की मूल संरचना होती, तो इन यात्रियों के विवरणों में उसका स्पष्ट उल्लेख अवश्य होता।
आधुनिक अर्थों में “कास्ट” की अवधारणा का उद्भव औपनिवेशिक काल में हुआ। अंग्रेज़ी शासन को भारत को समझने से अधिक उसे प्रशासित करना था। शासन के लिए समाज को गिनने योग्य और वर्गीकृत करना आवश्यक था। 1871 के बाद शुरू हुई जनगणनाओं में पहली बार लोगों से उनकी “जाति” पूछी गई और उसे सरकारी रजिस्टरों में स्थायी पहचान बना दिया गया। वर्ण, पेशा, कुल और स्थानीय पहचान—इन सबको एक ही प्रशासनिक श्रेणी में समेट दिया गया। यहीं से समाज की तरल संरचना कठोर वर्गों में बदलने लगी।
इस प्रक्रिया का प्रभाव आँकड़ों में स्पष्ट दिखाई देता है। 1901 की जनगणना में जिन समुदायों को “अस्पृश्य” कहा गया, उनकी संख्या लगभग 2.5 प्रतिशत बताई गई। यह दर्शाता है कि सामाजिक बहिष्कार की समस्या सीमित थी। परंतु 1931 तक आते-आते यह संख्या लगभग 17 प्रतिशत कर दी गई। यह वृद्धि किसी अचानक सामाजिक पतन का परिणाम नहीं थी, बल्कि परिभाषा के विस्तार का परिणाम थी। अब अस्पृश्यता में गरीबी, ग्रामीण पिछड़ापन और शिक्षा की कमी जैसे तत्व जोड़ दिए गए।
स्वतंत्रता के बाद यह अपेक्षा थी कि यह औपनिवेशिक वर्गीकरण समाप्त होगा, परंतु राजनीति ने इसे और मजबूत किया। संविधान में किए गए संरक्षणात्मक प्रावधान, जो संक्रमणकालीन माने गए थे, धीरे-धीरे स्थायी पहचान में बदल गए। 1980 के दशक में मंडल आयोग और उससे जुड़ी राजनीति ने इस प्रक्रिया को निर्णायक मोड़ दिया। 1989–90 के बाद “पिछड़ा वर्ग” की परिभाषा इतनी विस्तृत कर दी गई कि समाज का 60 प्रतिशत से अधिक भाग शोषित-वंचित-पिछड़ा घोषित कर दिया गया।
यह समझना आवश्यक है कि यहाँ संख्या नहीं बढ़ी, बल्कि श्रेणी का दायरा फैलता चला गया। हजारों ऐसे सामाजिक समूह, जो न अस्पृश्य थे और न सामाजिक बहिष्कार में थे, उन्हें भी एक ही प्रशासनिक पहचान में जोड़ दिया गया। इसके साथ-साथ एक नैरेटिव गढ़ा गया—SC, ST और OBC जन्म से शोषित हैं और तथाकथित सामान्य वर्ग जन्म से शोषणकर्ता है। यह धारणा न शास्त्रों से आती है, न इतिहास से; यह आधुनिक राजनीति और वैचारिक ढाँचों का निर्माण है।
इस संदर्भ में आचार्य धर्मपाल का शोध अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने ब्रिटिश अभिलेखों के आधार पर दिखाया कि औपनिवेशिक काल से पहले भारत में समाज-आधारित शिक्षा और स्वावलंबी अर्थव्यवस्था व्यापक थी। जिन समुदायों को बाद में पिछड़ा कहा गया, वे अपने-अपने शिल्प, कृषि और ज्ञान-परंपराओं में दक्ष थे। औपनिवेशिक शासन ने पहले इन संस्थाओं को तोड़ा और फिर उन्हीं समाजों को पिछड़ा घोषित किया।
आज जाति समाज का वर्णन नहीं, बल्कि संघर्ष का औज़ार बन गई है। आँकड़ों और प्रशासनिक श्रेणियों के माध्यम से समाज को स्थायी पीड़ित और स्थायी अपराधी के खाँचों में बाँटा जा रहा है। व्यक्ति का वर्तमान जीवन, उसका कर्म और उसका योगदान—सब गौण हो जाता है। पहचान ही सत्य बना दी जाती है।
भारतीय परंपरा में समाज को जोड़ने की दृष्टि थी, तोड़ने की नहीं। दोष का उपचार खोजा गया, दोष को स्थायी पहचान नहीं बनाया गया। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इस कृत्रिम वर्ग संघर्ष को पहचानें और समझें कि “कास्ट” हिंदू परंपरा की अवधारणा नहीं, बल्कि औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक राजनीति का निर्माण है। समाज की पुनर्स्थापना जाति के खाँचों में नहीं, बल्कि समरसता, समाज-बोध और कर्तव्य-प्रधान दृष्टि में निहित है।

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