मोबाइल स्क्रीन पर चल रहा है नया महाभारत

अमरदीप जौली

✍️दीपक कुमार द्विवेदी

वर्तमान समय का संघर्ष केवल राजनीतिक सत्ता प्राप्ति का संघर्ष नहीं रह गया है। यह मूलतः धर्म और अधर्म का संघर्ष है। यह वही सनातन संघर्ष है जो सृष्टि के प्रारंभ से चला आ रहा है। युग बदलते रहे, साम्राज्य बदलते रहे, युद्ध की पद्धतियाँ बदलती रहीं, परंतु संघर्ष का मूल स्वरूप कभी नहीं बदला। आज भी संसार उसी संघर्ष के मध्य खड़ा है। केवल अंतर इतना है कि पहले युद्ध प्रत्यक्ष दिखाई देते थे, आज युद्ध अदृश्य हो चुके हैं। पहले युद्ध तलवारों, अस्त्रों और सेनाओं से लड़े जाते थे, आज युद्ध विचारों, नैरेटिवों, डिजिटल माध्यमों, एल्गोरिद्म, मनोरंजन, शिक्षा, मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मनुष्य की आत्मा पर प्रभाव डालने वाली मनोवैज्ञानिक तकनीकों से लड़े जा रहे हैं।

वैदिक दृष्टि में धर्म किसी पंथ, मजहब, रिलिजन अथवा उपासना-पद्धति का नाम नहीं है। धर्म का अर्थ है—वह व्यवस्था जिसे सम्पूर्ण लोक धारण करता है। धर्म वह है जो सृष्टि को संतुलित रखता है। धर्म वह है जो जीवन को मर्यादा देता है। धर्म वह है जो मनुष्य, समाज, प्रकृति और ब्रह्मांड के मध्य संतुलन बनाए रखता है। वैदिक परंपरा में इसे “ऋतम्” कहा गया। अंग्रेज़ी में यदि इसका निकटतम शब्द खोजा जाए तो “Cosmic Order” सबसे समीप आता है। अर्थात वह सार्वभौमिक व्यवस्था जिसके आधार पर सम्पूर्ण सृष्टि संचालित होती है।

इसी कारण वैदिक धर्म केवल एक रिलिजन नहीं है। यह किसी पैगंबर, किसी एक पुस्तक, किसी एक ऐतिहासिक घटना अथवा किसी सीमित समूह पर आधारित व्यवस्था नहीं है। यह स्वयं सृष्टि के नियमों का ज्ञान है। धर्म का अर्थ था—सत्य, ऋतम्, संतुलन, मर्यादा, आत्मानुशासन, कर्तव्य और लोककल्याण।

इसके विपरीत अधर्म वह है जो सृष्टि व्यवस्था को तोड़ता है। जो संतुलन को नष्ट करता है। जो समाज को स्थायी संघर्षों में बाँटता है। जो मनुष्य को प्रकृति, परिवार, संस्कृति और आत्मा से काटता है। जो केवल भोग, शक्ति, स्वार्थ और अहंकार को जीवन का केंद्र बना देता है। इसलिए वैदिक दृष्टि में अधर्म केवल पाप नहीं, बल्कि सृष्टि व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह है।

महाभारत इसी सनातन संघर्ष का सबसे विराट प्रतीक है। महाभारत केवल हस्तिनापुर के सिंहासन का युद्ध नहीं था। वह धर्म और अधर्म का युद्ध था। वह देवत्त्व और असुरत्व की प्रवृत्तियों का युद्ध था। उस समय भी असुर और देवता केवल बाहरी शक्तियाँ नहीं थे, बल्कि मनुष्य के भीतर उपस्थित दो विपरीत जीवन-दृष्टियाँ थीं। देवत्त्व का अर्थ था—मर्यादा, संयम, सत्य, कर्तव्य, आत्मानुशासन, लोककल्याण और धर्म की रक्षा; जबकि असुरत्व का अर्थ था—अहंकार, अति-भोग, छल, अधर्म, अराजकता और केवल शक्ति तथा उपभोग को ही जीवन का केंद्र मान लेना।

महाभारत में दुर्योधन स्वयं स्वीकार करता है—

“जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः।
जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः॥”

अर्थात — “मैं धर्म को जानता हूँ, परंतु उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं है। मैं अधर्म को भी जानता हूँ, परंतु उससे निवृत्ति नहीं होती।”

यही असुरत्व का वास्तविक स्वरूप है। असुरत्व केवल अज्ञान नहीं है। अनेक बार असुरत्व धर्म को जानता है, सत्य को जानता है, परंतु उसकी रुचि अधर्म में होती है। उसकी प्रवृत्ति भोग, स्वार्थ, शक्ति और अराजकता की ओर होती है। यही कारण है कि महाभारत का संघर्ष केवल बाहरी युद्ध नहीं था, बल्कि मनुष्य की आंतरिक प्रवृत्तियों का भी युद्ध था।

आज भी वही संघर्ष चल रहा है। अंतर केवल इतना है कि आज का युद्ध प्रत्यक्ष नहीं है। पहले शत्रु सामने दिखाई देता था, आज वह विचारों के भीतर छिपा है। वह मनोरंजन के भीतर छिपा है। वह ट्रेंड्स के भीतर छिपा है। वह एल्गोरिद्म के भीतर छिपा है। वह डिजिटल संस्कृति के भीतर छिपा है। वह शिक्षा और मीडिया के भीतर छिपा है।

मार्क्सवाद का नया वर्जन कल्चरल मार्क्सवाद है, जिसकी वैचारिक दिशा 1923 के बाद विशेष रूप से एंटोनियो ग्राम्सी तथा बाद में फ्रैंकफर्ट स्कूल के विचारकों द्वारा विकसित की गई। पारंपरिक मार्क्सवाद जहाँ केवल आर्थिक संघर्ष और वर्ग संघर्ष पर केंद्रित था, वहीं कल्चरल मार्क्सवाद ने संस्कृति, शिक्षा, मीडिया, परिवार, साहित्य, मनोरंजन, भाषा, इतिहास और सामाजिक संस्थाओं को वैचारिक संघर्ष का केंद्र बनाया।

कार्ल मार्क्स का मूल सिद्धांत आर्थिक संघर्ष पर आधारित था। मार्क्स का मानना था कि समाज दो वर्गों में बँटा हुआ है शोषक और शोषित। उसके अनुसार पूंजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध मजदूर वर्ग क्रांति करेगा और समाजवादी व्यवस्था स्थापित होगी। परंतु यूरोप में अपेक्षित मजदूर क्रांति नहीं हुई। इसके बाद मार्क्सवादी विचारकों ने आत्ममंथन किया कि आखिर पश्चिमी समाजों में मार्क्सवादी क्रांति सफल क्यों नहीं हो रही।
इसी संदर्भ में एंटोनियो ग्राम्सी ने “कल्चरल हेगेमनी” अर्थात सांस्कृतिक वर्चस्व का सिद्धांत दिया। ग्राम्सी ने स्पष्ट कहा कि किसी भी सभ्यता को केवल राजनीतिक सत्ता से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। समाज की वास्तविक शक्ति उसकी संस्कृति, उसकी शिक्षा, उसकी परंपराएँ, उसका इतिहास, उसका परिवार और उसकी सामूहिक मानसिकता में होती है। यदि किसी समाज को स्थायी रूप से बदलना है तो पहले उसकी सांस्कृतिक आत्मा को बदलना होगा।

यहीं से कल्चरल मार्क्सवाद की वास्तविक शुरुआत हुई। आगे चलकर फ्रैंकफर्ट स्कूल के विचारकों मैक्स होर्खाइमर, थियोडोर अडोर्नो, हर्बर्ट मार्क्यूज़, एरिख फ्रॉम, वाल्टर बेंजामिन आदि—ने इस विचार को और विस्तारित किया। उन्होंने समझा कि आधुनिक समाज में प्रत्यक्ष क्रांति की जगह मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक युद्ध अधिक प्रभावी होगा। इसलिए संघर्ष का केंद्र आर्थिक ढाँचे से हटाकर संस्कृति और समाज की मूल संस्थाओं पर लाया गया।

यहीं से शिक्षा संस्थानों, मीडिया, साहित्य, सिनेमा, पत्रकारिता, कला, विश्वविद्यालयों, मनोरंजन उद्योग और बाद में डिजिटल प्लेटफॉर्म को वैचारिक संघर्ष के साधन के रूप में उपयोग किया जाने लगा। उद्देश्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि समाज की मूल आत्मा को बदलना था। परिवार व्यवस्था को कमजोर करना, परंपराओं को पिछड़ा सिद्ध करना, इतिहास के प्रति अपराधबोध उत्पन्न करना, आध्यात्मिकता का उपहास करना, संस्कृति को केवल मनोरंजन में बदल देना, नई पीढ़ी को उसकी जड़ों से काट देना ये सब उसी दीर्घकालिक प्रक्रिया का भाग बने।

वर्तमान समय में कल्चरल मार्क्सवाद केवल एक विचारधारा नहीं रह गया, बल्कि आधुनिक सभ्यतागत मनोवैज्ञानिक युद्ध का विशाल तंत्र बन चुका है। इसके 900 से अधिक टूल और वैचारिक वेरियंट दिखाई देते हैं। इनमें क्रिटिकल थ्योरी, क्रिटिकल रेस थ्योरी, क्रिटिकल कास्ट थ्योरी, पोस्टमॉडर्निज़्म, वोकिज्म, कैंसल कल्चर, डीईआई (Diversity, Equity and Inclusion), LGBTQ वैचारिकी, जेंडर फ्लुइडिटी, पहचान की राजनीति, इंटरसेक्शनैलिटी, पीड़ित बनाम उत्पीड़क फ्रेमवर्क, माइक्रो-अग्रेशन सिद्धांत, सुरक्षित स्पेस संस्कृति, ट्रिगर वार्निंग राजनीति, पोस्ट-ट्रुथ नैरेटिव, डिजिटल डोपामाइन संस्कृति, एल्गोरिद्मिक नियंत्रण, डेटा माइक्रो-टार्गेटिंग, कॉर्पोरेट एक्टिविज्म, चयनात्मक मानवाधिकार विमर्श, नैरेटिव इंजीनियरिंग, सोशल इंजीनियरिंग, भावनात्मक पत्रकारिता, डिजिटल लिंचिंग, शैडो बैनिंग, डीपफेक प्रोपेगेंडा, एआई आधारित राय निर्माण, ट्रेंड मैनेजमेंट, वायरल आक्रोश मॉडल, मीम युद्ध, डिजिटल प्रचार युद्ध, कॉर्पोरेट वर्चु सिग्नलिंग, भावनात्मक ध्रुवीकरण, डिजिटल भीड़तंत्र, लाइक आधारित आत्ममूल्य, सोशल वैलिडेशन मानसिकता, डिजिटल प्रसिद्धि मॉडल, वर्चुअल एक्टिविज्म, ऑनलाइन प्रतिष्ठा ध्वंस अभियान, संस्कृति का बाजारीकरण, उपभोक्तावाद, अतिवादी व्यक्तिवाद, परिवार-विरोधी कथानक, मातृत्व-विरोधी विमर्श, पारंपरिक पुरुषत्व पर आक्रमण, विवाह संस्था का विघटन, इतिहास का पुनर्पाठ, सभ्यतागत अपराधबोध निर्माण, राष्ट्रभक्ति को कट्टरता बताना, अंग्रेज़ी मानसिक उपनिवेशवाद, ध्यान अर्थव्यवस्था, एल्गोरिद्मिक फ़िल्टरिंग, पहचान आधारित राजनीति, जातीय ध्रुवीकरण, भाषाई वैमनस्य, क्षेत्रीय अस्मिता संघर्ष, डिजिटल व्यसन संस्कृति, त्वरित डोपामाइन प्रणाली, स्क्रीन आधारित सामाजिक अलगाव, वास्तविक संबंधों का क्षरण, संस्कृति की जगह कंटेंट, ज्ञान की जगह वायरलता, गुरु की जगह इन्फ्लुएंसर, अध्ययन की जगह स्क्रॉलिंग, आध्यात्मिकता का बाजारीकरण, योग का उत्पादकरण, लोक परंपराओं का मनोरंजनकरण, भावनात्मक एआई मॉडल, व्यवहार पूर्वानुमान प्रणाली, डिजिटल उपनिवेशवाद, सूचना साम्राज्यवाद, संकट आधारित सत्ता विस्तार और भय आधारित सामाजिक नियंत्रण जैसे अनेक औजार सम्मिलित हैं।

इन सभी टूलों की मूल प्रवृत्ति समाज को स्थायी संघर्षों में बाँटना है। पहले संघर्ष आर्थिक वर्गों के नाम पर था, आज संघर्ष पहचान आधारित बना दिया गया है। अब समाज को जाति, नस्ल, जेंडर, भाषा, क्षेत्र, रंग, लैंगिक पहचान, ऐतिहासिक अपराधबोध और पीड़ित-उत्पीड़क फ्रेमवर्क के आधार पर विभाजित किया जाता है। संघर्ष का स्वरूप बदल गया, परंतु मूल मानसिकता वही रही—समाज को स्थायी रूप से विभाजित रखना।

इन सभी की मूल प्रवृत्ति समाज को स्थायी संघर्षशील वर्गों में बाँटना है। यही अब्राहमिक रिलिजन आधारित मानसिक संरचना का मूल स्वरूप रहा है विश्वासी और अविश्वासी, चुने हुए और अचुने हुए, मानो या मरो। आगे चलकर यही प्रवृत्ति आधुनिक राजनीतिक विचारधाराओं में “शोषक और शोषित”, “उत्पीड़क और पीड़ित”, “प्रिविलेज्ड और ओप्रेस्ड”, “बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक” जैसे नए रूपों में दिखाई देती है। संघर्ष का स्वरूप बदलता गया, परंतु समाज को स्थायी द्वंद्व में बाँटने की मानसिकता बनी रही।

इसके विपरीत वैदिक दृष्टि समाज को संघर्ष नहीं, बल्कि संतुलन और सह-अस्तित्व के रूप में देखती है। “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” का अर्थ यह नहीं है कि सभी विचारधाराएँ समान हैं। इसका अर्थ है कि सत्य एक है, परंतु उस सत्य को जानने वाले ऋषि उसे अनेक प्रकार से अभिव्यक्त करते हैं। यह वैदिक सत्यदृष्टि उन लोगों के लिए है जो आत्मा, ब्रह्म, पुनर्जन्म, कर्म सिद्धांत और ऋतम् को स्वीकार करते हैं।

इसी प्रकार “वसुधैव कुटुम्बकम्” का अर्थ सम्पूर्ण संसार को बिना किसी विवेक के एक परिवार मान लेना नहीं है। इसका भाव यह है कि जो सम्पूर्ण सृष्टि में एक ही ब्रह्म तत्व को देखते हैं, जो प्रकृति और जीवन के संतुलन को स्वीकार करते हैं, जो धर्म के आधार पर जीवन जीते हैं, उनके लिए सम्पूर्ण पृथ्वी परिवार के समान है।

“सर्वे भवन्तु सुखिनः” का अर्थ भी अधर्म और अराजकता को संरक्षण देना नहीं है। इसका वास्तविक भाव धर्मसम्मत लोककल्याण है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में सत्यनारायण कथा के अंत में उद्घोष होता है

“धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो, गौ हत्या बंद हो।”

यही धर्म का वास्तविक स्वरूप है। धर्म का अर्थ केवल सहिष्णुता नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा और अधर्म का प्रतिरोध भी है। जहाँ अधर्म सृष्टि व्यवस्था को नष्ट करता है, वहाँ उसका प्रतिरोध ही धर्म है।

वर्तमान समय की सबसे बड़ी समस्या यह है कि आधुनिक अधार्मिक संरचनाएँ धीरे-धीरे मनुष्य को उसकी जड़ों से काट रही हैं। परिवार को पुरानी संस्था कहा जा रहा है। विवाह को बंधन कहा जा रहा है। मातृत्व को बोझ बताया जा रहा है। पितृत्व का उपहास किया जा रहा है। गुरु-शिष्य परंपरा को पिछड़ापन कहा जा रहा है। इतिहास को केवल अत्याचार की कथा बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। संस्कृति को केवल मनोरंजन में बदल दिया गया है। आध्यात्मिकता को बाज़ार का उत्पाद बना दिया गया है। योग को केवल शारीरिक व्यायाम तक सीमित कर दिया गया है। ज्ञान की जगह वायरलता ने ले ली है। अध्ययन की जगह स्क्रॉलिंग ने ले ली है। गुरु की जगह इन्फ्लुएंसर ने ले ली है। परिवार की जगह डिजिटल समुदाय खड़े किए जा रहे हैं।

पहले युद्ध सीमाओं पर लड़े जाते थे, आज युद्ध मोबाइल स्क्रीन पर लड़े जा रहे हैं। पहले सेनाएँ युद्धभूमि में उतरती थीं, आज एल्गोरिद्म, ट्रेंड्स, वायरल वीडियो, वेब सीरीज़, मनोरंजन उद्योग और डिजिटल प्लेटफॉर्म समाज की दिशा तय करते हैं। पहले शस्त्र दिखाई देते थे, आज नैरेटिव दिखाई देते हैं। पहले शरीरों को गुलाम बनाया जाता था, आज आत्माओं को नियंत्रित करने का प्रयास हो रहा है।

आज सूचना युद्ध है। सांस्कृतिक युद्ध है। डिजिटल युद्ध है। मनोवैज्ञानिक युद्ध है। एल्गोरिद्मिक युद्ध है। यही कारण है कि अब केवल पारंपरिक संघर्ष पर्याप्त नहीं है। यदि अधर्म ने अपने औजार बदल लिए हैं तो धर्म की रक्षा के लिए भी समयानुकूल रणनीति बनानी होगी।

धर्म की रक्षा केवल नारों से नहीं होगी। उसके लिए वैचारिक स्पष्टता चाहिए। सांस्कृतिक आत्मबोध चाहिए। परिवार व्यवस्था को पुनः सुदृढ़ करना होगा। नई पीढ़ी को इतिहास, दर्शन, संस्कार और सभ्यता से जोड़ना होगा। शिक्षा को केवल नौकरी का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मबोध का साधन बनाना होगा। आधुनिक तकनीक का उपयोग केवल मनोरंजन और उपभोग के लिए नहीं, बल्कि सभ्यता संरक्षण और धर्म रक्षा के लिए करना होगा।

दुनिया को पूर्णतः बदल देना संभव नहीं है, परंतु धर्म के बीज की रक्षा करना आवश्यक है। क्योंकि जब तक धर्म जीवित है, तब तक ऋतम् जीवित है। जब तक ऋतम् जीवित है, तब तक सृष्टि का संतुलन जीवित है। और जब तक मनुष्य के भीतर देवत्त्व जीवित है, तब तक कोई भी असुरत्व स्थायी रूप से विजय प्राप्त नहीं कर सकता।

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