भगवान गणेश को दूर्वा क्यों चढ़ाई जाती है?

अमरदीप जौली

नंदी जो भगवान शिव के निष्ठावान द्वारपाल और संदेशवाहक हैं, माँ पार्वती की प्रार्थनाओं और इच्छाओं को सीधे महादेव तक पहुंचाने का माध्यम बन जाते हैं। यह क्षण भक्त और भगवान के बीच के शाश्वत संबंध को दर्शाता है, जिसमें नंदी “महादेव” तक पहुंचने का सेतु हैं। नंदी से जुड़ी एक बेहद रोचक कथा हमें प्राचीन काल में शिव और पार्वती के बीच खेले गए एक पासे के खेल तक ले जाती है। इस खेल में माँ पार्वती ने जीत हासिल की, लेकिन एक विवाद के चलते नंदी को मध्यस्थ के रूप में बुलाया गया। सभी को हैरान करते हुए, नंदी ने भगवान शिव को विजेता घोषित कर दिया। नंदी के इस निर्णय ने माँ पार्वती को क्रोधित कर दिया, और उन्होंने नंदी को एक भयंकर रोग का श्राप दे दिया।अपनी गलती का एहसास होते ही, नंदी ने विनम्रता से माफी मांगी और स्वीकार किया कि उन्होंने यह निर्णय अपनी अटूट भक्ति और निष्ठा के कारण लिया। वह अपने स्वामी को हारता हुआ नहीं देख सकते थे। नंदी की इस भक्ति से माँ पार्वती का हृदय पिघल गया, और उन्होंने श्राप को हटाने का निर्णय लिया, लेकिन एक शर्त पर। उन्होंने नंदी से कहा कि अगली चतुर्दशी पर उन्हें अपनी सबसे प्रिय वस्तु भगवान गणेश को अर्पित करनी होगी।पूरे विश्वास और समर्पण के साथ, नंदी ने भगवान गणेश को हरी दूर्वा घास, जो कि उनके जीवन का मुख्य आधार थी, अर्पित कर दी। भगवान गणेश ने इस भेंट को सहर्ष स्वीकार किया, और नंदी का श्राप समाप्त हो गया। तब से आज तक, भगवान गणेश को दूर्वा चढ़ाने की यह परंपरा भक्ति और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए निभाई जाती है।यह अमर कथा भक्ति, प्रेम, निष्ठा और क्षमा का एक दिव्य संदेश देती है, जो शिव, पार्वती, नंदी और गणेश के बीच शाश्वत संबंधों को दर्शाती है।

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