हिन्दू नववर्ष- चैत्र शुक्ल वर्ष प्रतिपदा
चैत्र 6 प्रविष्टे, शुक्ल प्रतिपदा युगाब्द 5128 विक्रमी संवत 2083 रौद्र नामक संवत्सर -19 मार्च 2026
वर्ष प्रतिपदा (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) हिंदू नववर्ष का पावन आरंभ है। यह प्राकृतिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण है, जिसे गुड़ी पड़वा, उगादी, नव संवत्सर आदि नामों से पूरे भारत में मनाया जाता है। यह दिन वसंत ऋतु, नई फसल और भारतीय संस्कृति के संरक्षण का प्रतीक है। ऋतु परिवर्तन वसंत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। जो ऊर्जा, समृद्धि और नए जीवन के प्रारम्भ का संकेत है। दुनिया में हमारी सबसे प्राचीन संस्कृति है। सृष्टि संवत् 1,96,08,53,128 आज से प्रारम्भ हो रहा है। युगाब्द् संवत् 5,128 आज से प्रारम्भ हो रहा है। विक्रमी संवत् 2,083 आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से (ईस्वी 19 मार्च 2026) से प्रारम्भ हो रहा है।
हिन्दू पंचांग की प्रथम तिथि को ‘प्रतिपदा’ कहा जाता है। इसमें ‘प्रति’ का अर्थ है – सामने और ‘पदा’ का अर्थ है – पग बढ़ाना। नववर्ष का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल ‘प्रतिपदा’ से ही माना जाता है और इसी दिन से ग्रहों, वारों, मासों और संवत्सरों का प्रारंभ गणितीय और खगोल शास्त्रीय संगणना के अनुसार माना जाता है। आज भी जनमानस से जुड़ी हुई यही शास्त्रसम्मत कालगणना व्यावहारिकता की कसौटी पर खरी उतरी है। इसे राष्ट्रीय गौरवशाली परंपरा का प्रतीक माना जाता है। हिन्दू पंचांग किसी संकुचित विचारधारा या पंथाश्रित नहीं है। यह संवत्सर किसी देवी, देवता या महान पुरुष के जन्म पर आधारित नहीं, ईस्वी या हिजरी सन की तरह किसी जाति अथवा संप्रदाय विशेष का नहीं है। हमारी गौरवशाली परंपरा विशुद्ध अर्थो में प्रकृति के खगोलशास्त्रीय सिद्धातों पर आधारित है और भारतीय कालगणना का आधार पूर्णतया पंथ निरपेक्ष है। प्रतिपदा का यह शुभ दिन भारत राष्ट्र की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है। वर्ष प्रतिपदा उत्सव के मुख्य बिंदु:
भारतीय संस्कृति में ‘वर्षप्रतिपदा’ का ऐतिहासिक, धार्मिक व वैज्ञानिक महत्व:
- सृष्टि की रचना: ब्रह्मा जी ने इसी दिन सूर्योदय से सृष्टि की रचना प्रारंभ की, इसलिए इसे ‘युगादि’ अर्थात युग का आदि अर्थात प्रारम्भ या नवजीवन का पहला दिन माना जाता है। अत: सृष्टि का रचना ब्रह्मा जी ने इसी दिन से की। इस दिन का वैज्ञानिक और खगोलीय महत्व है। इसी दिन से ग्रहों, वारों, मासों और संवत्सरों की गणना शुरू होती है। आज से सृष्टि संवत 1,96,08,53,128 प्रारम्भ हो रहा है।
- भगवान राम का राज्याभिषेक: भगवान राम का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का इसी शुभ तिथि पर लंका विजय के बाद अयोध्या लौटकर राज्याभिषेक हुआ। इसी दिन भगवान राम ने बाली के अत्याचार से दक्षिण की प्रजा को मुक्त कराया था, जिसके बाद घर-घर में गुड़ी अर्थात विजय पताका फहराई गई।
- नवरात्र का प्रारम्भ: शक्ति और भक्ति की उपासना का नौ दिन पावन पर्व चैत्र नवरात्र का पहला दिन इसी तिथि से शुरू होता है। छ: मास के लिए शक्ति का संचय की साधन का पर्व।
- युधिष्ठिर का राज्याभिषेक: युधिष्ठिर का राज्याभिषेक महाभारत युद्ध की समाप्ति के पश्चात इसी के पावन दिन को हुआ। यह ऐतिहासिक घटना द्वापर युग के अंत और कलियुग का प्रारम्भ माना जाता है। आज से कलियुगाब्द 5128 प्रारम्भ हो रहा है। 28 वे महायुग का कलियुग चल रह है।
- ऐतिहासिक विजय: इसी दिन सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को हराकर भारत में विक्रम संवत की स्थापना की थी। यह दिन राष्ट्र की एकता और विजय पताका अर्थात गुड़ी फहराने के लिए मनाया जाता है। आज से विक्रमी संवत् 2083 प्रारम्भ हो रहा है। राजा विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना। अत: राजा विक्रमादित्य और शालिवाहन द्वारा हूणों-शकों को परास्त कर श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने का दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (हिंदू नव वर्ष) माना जाता है। 57 ईसा पूर्व में राजा विक्रमादित्य ने शकों को हराकर ही विक्रम संवत की स्थापना की थी और महाराज शालिवाहन ने भी हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना और शक संवत की स्थापना की।
- आर्य समाज जी स्थापना: महर्षि दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज जी स्थापना कर वेद अध्ययन व शुद्धि आंदोलन प्रारम्भ किया।
- गुरु अंगददेव का जन्मदिवस: द्वितीय सिख गुरु अंगददेव का जन्म भी पावन दिन को हुआ।
- डॉ. हेडगेवार का जन्मदिवस: विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार का जन्म इसी दिन हुआ था। यह पर्व संघ के छह मुख्य उत्सवों में से यह एक है।
- महर्षि गौतम जी का जन्मदिवस : महर्षि गौतम जी का जन्म इसी दिन हुआ।
- वरुणावतर संत झुलेलाल का जन्मदिवस: वरुणावतर संत झुलेलाल का जन्म इसी दिन हुआ।
- वैज्ञानिक और प्राकृतिक महत्व: यह वसंत ऋतु का समय होता है, जब शीत ऋतु समाप्त होती है और प्रकृति में नयापन आता है। यह ऋतुराज वसंत की शुरुआत का संकेत है, जहाँ वृक्षों पर नए कोपलें, पत्ते और फूल आते हैं। यह समय प्रकृति में नवजीवन (फूलों-पत्तियों) का होता है और फसल पकने के कारण किसान की मेहनत का फल मिलने का समय होता है। यह समय दो ऋतुओं का संधिकाल है। इसमें रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। प्रकृति नया रूप धर लेती है। प्रतीत होता है कि प्रकृति नवपल्लव धारण कर नव संरचना के लिए ऊर्जस्वित होती है। मानव, पशु-पक्षी, यहां तक कि जड़-चेतन प्रकृति भी प्रमाद और आलस्य को त्याग सचेतन हो जाती है। वसंतोत्सव का भी यही आधार है। इसी समय बर्फ पिघलने लगती है। आमों पर बौर आने लगता है। प्रकृति की हरीतिमा नवजीवन का प्रतीक बनकर हमारे जीवन से जुड़ जाती है।
- सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व: यह दिन राष्ट्र की गौरवशाली परंपरा और सनातन संस्कृति से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है। आज यह दिन हमारे सामाजिक और धार्मिक कार्यों के अनुष्ठान की धुरी के रूप में महत्वपूर्ण तिथि बनकर मान्यता प्राप्त कर चुका है। यह राष्ट्रीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक धरोहर को बचाने वाला पुण्य दिवस है। हम प्रतिपदा से प्रारंभ कर नौ दिन में छह मास के लिए शक्ति संचय करते हैं, फिर अश्विन मास की नवरात्रि में शेष छह मास के लिए शक्ति संचय करते हैं। आज भी भारत में प्रकृति, शिक्षा तथा राजकीय कोष आदि के चालन-संचालन में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही देखते हैं।
- नाम करण: इस दिन को देश में अलग-2 नाम से जाना जाता है। इसे महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश में उगादी, तमिलनाडु में पुथांडु और सिंधी समुदाय में चेती चंड के रूप में तथा उतर भारत में नव संवत के रूप में मनाया जाता है। यह त्यौहार न केवल कैलेंडर की शुरुआत है, बल्कि देशवासियों में सांस्कृतिक चेतना और एकता को मजबूत करने का भी दिन है।
दुनिया में पंचांग का इतिहास
एक जनवरी से आज ईसाई नववर्ष का प्रारम्भ मानते हैं। यह ईसाई कलेंडर जो 1752 से पहले अपना नव वर्ष 25 मार्च को मानते थे। एक जनवरी से प्रारम्भ होने वाली कालगणना को ईसवी सन् के नाम से जानते हैं जिसका सम्बन्ध ईसाई जगत व ईसा मसीह से है। बाइबल के अनुसार, ईसा मसीह (यीशु) के जन्म के 8वें दिन (7 दिन पूरे होने के बाद) उनका खतना (Circumcision) किया गया और उनका नामकरण हुआ। यह दिन पारंपरिक रूप से 1 जनवरी को मनाया जाता है, जो उनके जन्म (25 दिसंबर) के ठीक आठवें दिन आता है। यह ईसवी सन् Roman God Janus के नाम पर Roman King Numa के द्वारा मूलतः प्रतिपादित, जूलियस सीसर के द्वारा प्रारम्भ, Pope Gregory Xlll के द्वारा 1582 में ठीक किया गया(करेक्टेड) और अंग्रेजों द्वारा 1752 में अंगीकृत है। Roman God Janus के नाम से जनवरी मास का नाम है । इसे रोम के सम्राट् जूलियस सीजर द्वारा ईसा के जन्म के तीन वर्ष पश्चात् प्रचलन में लाया गया। भारत में ईसवी सन् का प्रचलन अंग्रेज़ी शासकों ने 1752 के बाद में किया। 1752 से पहले ईसवी सन् 25 मार्च से शुरू होता था। 18 वीं शताब्दी से इसकी शुरुआत एक जनवरी से होने लगी। जनवरी से जून तकमास के नाम, रोमन के नामकरण रोमन जोनस, मार्स इत्यादि देवताओं के नाम पर है। जुलाई और अगस्त रोम के सम्राट् जूलियस सीजर तथा उसके पौत्र आगस्टस के नाम पर तथा सितम्बर से दिसम्बर तक रोमन संवत के मासों के नाम सप्त, अष्ठ, नवम व दशम के आधार पर रखे गये हैं। क्या ये आधार सही है?
जिस प्रकार ईसवी संवत् का सम्बन्ध ईसा से है, उसी प्रकार हिजरी संवत् का सम्बन्ध मुस्लिम जगत और हज़रत मुहम्मद से है। हिजरी संवत् आज से(19 मार्च 2026) 1404 वर्ष पूर्व 16 जुलाई 612 को यह प्रारम्भ हुआ। यह पूरी तरह से चंद्रमा के चक्र अर्थात चंद्रमा के दर्शन पर आधारित है। वर्ष 354 या 355 दिन का होता है। जो ग्रेगोरियन (अंग्रेजी) कैलेंडर से 10-11 दिन छोटा होता है।
किन्तु विक्रमी संवत् का सम्बन्ध किसी भी पंथ, संप्रदाय से न होकर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धांत व ब्रह्मांड के ग्रहों व नक्षत्रों से है। इसलिए भारतीय काल गणना पंथ निरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना व राष्ट्र की गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है। इतना ही नहीं, ब्रह्मांड के सबसे पुरातन ग्रंथों वेदों में भी इसका वर्णन है। नव संवत् यानि संवत्सरों का वर्णन यजुर्वेद के 27 वें तथा 30 वें अध्याय के मंत्र क्रमांक क्रमशः 45 व 15 में विस्तार से दिया गया है। विश्व को सौर मण्डल के ग्रहों व नक्षत्रों की चाल व निरन्तर बदलती उनकी स्थिति पर ही हमारे दिन, मास, वर्ष और उनके सूक्ष्मतम् भाग पर आधारित है। इसी वैज्ञानिक आधार के कारण ही पाश्चात्य देशों के अंधानुकरण के बावजूद, चाहे बच्चे के गर्भाधान की बात हो, गृह प्रवेश या व्यापार प्रारम्भ करने की बात हो हम एक कुशल पंडित के पास जाकर शुभ मुहूर्त पुछते हैं । देश के बड़े से बड़े व्यक्ति भी सत्तासीन होने के लिए सबसे पहले एक अच्छे मुहूर्त का इन्तजार करते हैं जो कि विशुद्ध रूप से विक्रमी संवत् के पञ्चाङ्ग पर आधारित होता है। भारतीय मान्यतानुसार कोई भी काम शुभ मुहूर्त में किया जाये तो उसकी सफलता में चार चाँद लग जाते हैं। अत: स्पष्ट है कि भारतीय नववर्ष मनाना ईसाई नववर्ष मनाने से पूर्ण रूपेण श्रेष्ठ है।
कालगणना का आधार तो ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित होना चाहिए। ग्रेगेरियन कैलेण्डर की कालगणना मात्र 2026 वर्ष की अति अल्प समय को दर्शाती है। जबकि यूनान की कालगणना 1,589 वर्ष, रोम की 2,764, यहूदी 5,775, मिस्र की 28,696, पारसी की 1,98,882 तथा चीन की 9,60,02,312, वर्ष पुरानी है। इन सबसे अलग यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो भारतीय कल गणना ज्योतिष के अनुसार पृथ्वी की आयु 1,96,08,53,127 वर्ष है। जिस काल गणना को सृष्टि संवत कहा जाता है। 1,96,08,53,128 वां वर्ष इस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ हो रहा है। जिसके व्यापक प्रमाण हमारे पास उपलब्ध हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों में एक-एक पल की गणना की गई है।
कलेंडर रिफार्म कमेटी
स्वतंत्र भारत की सरकार ने राष्ट्रीय पंचांग निश्चित करने के लिए प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. मेघनाथ साहा की अध्यक्षता में “कलेंडर रिफार्म कमेटी” का गठन किया था। जो रिपोर्ट तैयार हुई वह 1952 में “साइंस एंड कल्चर” पत्रिका में प्रकाशित हुई। रिपोर्ट के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं-
- ईस्वी सन का मौलिक संबध ईसाई पंथ से नहीं है। यह तो यूरोप के अर्ध सभ्य कबीलों में ईसा मसीह के बहुत पहले से ही चल रहा था।
- इसके एक वर्ष में 10 महीने और 304 दिन होते थे।
- पुरानी रोमन सभ्यता को भी तब तक ज्ञात नहीं था कि सौर वर्ष और चंद्रमास की अवधि क्या थी। यही दस महीने का साल वे तब तक चलाते रहे जब तक उनके नेता जूलियस सीजर ने इसमें संशोधन नहीं किया।
- ईसा के 530 वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद, ईसाई बिशप ने पर्याप्त कल्पनाएँ कर 25 दिसम्बर को ईसा का जन्म दिवस घोषित किया।
- 1572 में तेरहवें पोप ग्रेगरी महाशय ने कलेंडर को दस दिन आगे बढ़ाकर 5 अक्टूबर (शुक्रवार) को 15 अक्टूबर माना।
- ब्रिटेन ने इसे दो सौ वर्ष बाद 1775 में स्वीकार किया। ब्रिटेन ने इसमें 11 दिन की कमी की और 3 सितम्बर को 14 सितम्बर बना दिया।
- यूरोप के केलेंडर में 28, 29, 30, 31 दिनों के महीने होते हैं, जो विचित्र हैं। ये न तो किसी खगोलीय गणना पर आधारित हैं और न किसी प्रकृति चक्र पर।
कलेंडर रिफार्म कमेटी ने विक्रम संवत को राष्ट्रीय संवत बनाने की सिफारिश की। वास्तव में विक्रम संवत, ईसा संवत से 57 वर्ष पुराना था। परंतु तत्कालीन सरकार की ‘अंग्रेजी मानसिकता’ के चलते उन्हें यह सिफारिश पसंद नहीं आई। अत: राष्ट्रीय संवत शक संवत को घोषित किया जो ईसा संवत से 78 वर्ष बाद चला है। 12 मार्च 1957 को इसे आधिकारिक राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में अपनाया गया।
विदेशी कालगणना की विसंगतियां
चिल्ड्रन्स ब्रिटानिका vol 1.3-1964 में कलेंडर का इतिहास बताया है-
- अंग्रेजी कलेंडरों में अनेक बार गड़बड़ हुई हैं और इनमें कई संशोधन करने पड़े हैं। इनमें माह की गणना चन्द्र की गति से और वर्ष की गणना सूर्य की गति पर आधारित है। आज इसमें भी आपसी तालमेल नहीं है।
- ईसाई मत में ईसा मसीह का जन्म इतिहास की निर्णायक घटना है। अत: कालक्रम को B.C.(Before Christ) और A.D. (Anno Domini) अर्थात In the year of our Lord में बांटा गया। किन्तु यह पद्धति ईसा के जन्म के कुछ सदियों तक प्रचलन में नहीं आई।
रोमन कलेंडर– आज के ईस्वी सन का मूल रोमन संवत है। यह ईसा के जन्म के 753 वर्ष पूर्व रोम नगर की स्थापना से प्रारम्भ हुआ। तब इसमें 10 माह थे। (प्रथम माह मार्च से अन्तिम माह दिसम्बर तक) और वर्ष 304 दिन का होता था। बाद में रजा नूमा पिम्पोलिय्स ने दो माह (जनवरी, फरवरी) जोड़ दिए। तब से वर्ष 12 माह अर्थात 355 दिन का हो गया। यह ग्रहों की गति से मेल नहीं खाता था, तो जुलियस सीजर ने इसे 365 और ¼ दिन का करने का आदेश दे दिया। इसमें कुछ माह 30 और कुछ 31 दिन के बनाए गए और फरवरी का माह 28 दिनों का रहा जो चार वर्षों में 29 दिनों का होता है। इस प्रकार यह गणनाएं प्रारंभ से ही अवैज्ञानिक, असंगत, असंतुलित, विवादित एवं काल्पनिक रही।
सम्राट विक्रमादित्य द्वारा प्रतिपादित विक्रमी संवत
दो हजार वर्ष पहले शकों ने सौराष्ट्र और पंजाब को रौंदते हुए अवंतिका (उज्जैन) पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की। विक्रमादित्य ने राष्ट्रीय शक्तियों को एक सूत्र में पिरोया और शक्तिशाली मोर्चा खड़ा करके ईसा पूर्व 57 में शकों पर भीषण आक्रमण कर विजय प्राप्त की। थोड़े समय में ही इन्होंने कोंकण, सौराष्ट्र, गुजरात और सिंध भाग के प्रदेशों को भी शकों से मुक्त करावा लिया। वीर विक्रमादित्य ने शकों को उनके गढ़ अरब में भी क़रारी मात दी। ईरान मिस्र तक खधेड़ा। इसी सम्राट विक्रमादित्य के नाम पर भारत में विक्रमी संवत् प्रचलित हुआ। भारत में आज भी सरकारी और धार्मिक कार्यों विक्रमी संवत् प्रचलित है।
शालिवाहन द्वारा प्रतिपादित शक संवत्
भारतीय सरकार ने स्वतन्त्रता के बाद शक संवत् को अपनाया। शालिवाहन शक (शक संवत) 78 ईस्वी में शुरू हुआ एक ऐतिहासिक भारतीय कैलेंडर या पंचांग है, जिसे राजा शालिवाहन ने शकों पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में शुरू किया था। यह भारत का आधिकारिक राष्ट्रीय कैलेंडर है, जो वसंत ऋतु से शुरू होता है और चैत्र माह से गिना जाता है। आज से शक संवत 1948 प्रारम्भ हो रहा है। शालिवाहन ने शक आक्रमणकारियों को परास्त किया था। भारत सरकार ने 22 मार्च 1957 को इसे आधिकारिक राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में अपनाया। यह कैलेंडर भारत के अलावा दक्षिण-पूर्व एशिया (जावा, बाली) में भी ऐतिहासिक रूप से प्रयुक्त होता था और भारत में आज भी सरकारी और धार्मिक कार्यों (विशेषकर दक्षिण में) में प्रचलित है। यह विक्रम संवत (57 ईसा पूर्व) के बाद शुरू हुआ और उससे 135 वर्ष पीछे है। शक संवत के कैलेंडर की संरचना वैज्ञानिक है और यह सूर्य-चंद्रमा की स्थिति पर आधारित है।
भारतीय 12 मास के नाम का खगोलीय आधार
चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन। चैत्र मास ही हमारा प्रथम मास होता है, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष को नववर्ष मानते हैं। चैत्र मास अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार मार्च-अप्रैल में आता है, चैत्र के बाद वैशाख मास आता है जो अप्रैल-मई के मध्य में आता है, ऐसे ही बाकी महीने आते हैं। फाल्गुन मास हमारा अंतिम मास है जो फरवरी-मार्च में आता है। फाल्गुन की अंतिम तिथि से वर्ष की समाप्ती हो जाती है, फिर अगला वर्ष चैत्र मास का पुन: तिथियों का आरम्भ होता है। जिससे नववर्ष आरम्भ होता है। हमारे समस्त वैदिक मास का नाम 27 में से 12 नक्षत्रों के नामों पर रखे गये हैं। 27 नक्षत्र जो आकाश मंडल में चंद्रमा की गति के आधार पर क्रमबद्ध हैं। इन नक्षत्रों के नाम क्रम से इस प्रकार हैं: अश्विनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद, और रेवती।
जिस मास की पूर्णिमा को चन्द्रमा जिस नक्षत्र पर होता है उसी नक्षत्र के नाम पर उस मास का नाम हुआ या पहली होरा जिस नक्षत्र की पड़ती हो उस नाम का हुआ। दोनों एक ही बात है। चित्रा नक्षत्र से चैत्र मास, विशाखा नक्षत्र से वैशाख मास, ज्येष्ठा नक्षत्र से ज्येष्ठ मास, पूर्वाषाढा या उत्तराषाढा से आषाढ़, श्रावण नक्षत्र से श्रावण मास, पूर्वाभाद्रपद या उत्तराभाद्रपद से भाद्रपद, अश्विनी नक्षत्र से अश्विन मास, कृत्तिका नक्षत्र से कार्तिक मास, मृगशिरा नक्षत्र से मार्गशीर्ष मास, पुष्य नक्षत्र से पौष मास, माघा मास से माघ मास, पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी से फाल्गुन मास। चंद्र वर्ष 354 दिन और सौर वर्ष 365 दिन का होता है। चंद्र व सूर्य वर्ष के बीच के 11 दिनों के अंतर को समायोजित करने के लिए, हर तीन साल में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है। जिसे अधिमास/मलमास: कहा जाता है। चंद्र मास चंद्र की चाल व गणना व सूर्य मास की चाल व गणना पर आधारित होता है।
हिन्दू वर्ष सूर्य मास क्रम: चैत्र- 30 दिन, वैशाख-31 दिन, ज्येष्ठ-32 दिन, आषाढ़-31 दिन, श्रावण-31, भाद्रपद-31 दिन, आश्विन-31 दिन, कार्तिक-30 दिन, मार्गशीर्ष-29 दिन, पौष-30 दिन, माघ-29 दिन, फाल्गुन-30 दिन वर्ष का योग 365 दिन है।
भारतीय कालगणना और पंचांग
एक अंग्रेज अधिकारी ने प. मदन मोहन मालवीय से पूछा कि कुम्भ में इतना बड़ा जन सैलाब बगैर किसी निमंत्रण-पत्र के कैसे आ जाता है? पंडित जी ने उत्तर दिया “छः आने के पंचांग से!”
अपने देश के गाँवों में, शहरों में, वनों में, पहाड़ों पर या भारत के बाहर सैंकड़ों मील दूर विदेशों में हिन्दू कहीं भी रहें वह पंचांग जानता है। अपने त्यौहार, उत्सव, कुम्भ, विभिन्न देवस्थानों पर लगने वाले मेले सभी की तिथियाँ बगैर आमंत्रण, सूचना के उसे मालूम होती है। यहीं नहीं सौ वर्ष बाद किस दिन कहाँ कुम्भ होगा, दीपावली कब होगी, सूर्य एवं चंद्र ग्रहण कब होंगे, यह भी ज्योतिषी किसी समय भी बता सकते हैं।
काल की गणना दिन व रात, ऋतु तथा वर्ष के किसी न किसी रूप में प्राचीन काल से ही की जाती रही है। वर्तमान में काल की गणना ‘वर्ष’ द्वारा की जाती है। परंतु प्राचीन काल में यह गणना चन्द्रमा के उदय व विकास तथा ऋतुओं के परिवर्तन द्वारा की जाती थी। संसार के प्राचीनतम ग्रंथ ‘ऋग्वेद’ में एक वर्ष में तीन ऋतुओं – शरद, वसंत और हेमंत का होना बताया गया है। ऋतुओं की उत्पत्ति अथवा परिवर्तन सूर्य के कारण होता है। सूर्य को ऋतुओं का पिता कहा गया है। इसी कारण ऋतु चक्र, संवत्सर कहलाते हैं। एक संवत्सर में पाँच ऋतुये होती हैं और ऐसे पाँच ऋतु चक्रों का एक युग होता है। इन ऋतु चक्रों के नाम हैं – संवत्सर, परिवत्सर, इडात्सर, अनुवत्सर और उद्वत्सर। इन पाँच वत्सरो का गणित द्वारा अनुसन्धान कर उनका वर्णन करना पंचांग कहलाता है। सामान्य रुप से पंचांग में तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण बताये जाते हैं। पंचांग की मदद से आसानी से यह ज्ञात हो जाता है कि किस दिन क्या तिथि या वार है, वर्ष का आरम्भ कब हुआ, इस समय सूर्य और चन्द्रमा किस स्थान पर हैं इत्यादि इन सभी तथ्यों की जानकारी पंचांग देखने से मिलती हैं।
भारत में संवत का प्रचलन
शको के आने के पहले वेदांग ज्योतिष के अनुसार यहाँ वर्ष-गणना की जाती थी लेकिन अब सूर्य सिद्धांत तथा अन्य सिद्धांत के अनुसार वर्ष गणना की जाने लगी। ई. सन 400 के लगभग तो वेदांग ज्योतिष के अनुसार वर्ष गणना की जानी बिल्कुल बंद कर दी गई। ई. सन 400 व 1200 के बीच सम्पूर्ण भारत में ‘सिद्धांत ज्योतिष’ के अनुसार पंचांग बनने लगे। शक संवत् का प्रचलन सर्वत्र हो गया। राजा अपने नाम से भी संवत् चलाने लगे। प्रायः ये अपनी राजगद्दी पर बैठने के वर्ष से अपना संवत् चलाते थे। ये संवत् या तो सूर्य सिद्धांत, आर्य सिद्धांत या ब्रह्म सिद्धांत पर आधारित थे। धार्मिक गणना के लिए सम्पूर्ण भारत में तथा हिन्दू राजाओं के राज्यों में इसी प्रकार वर्ष गणना चलती रही लेकिन 1200 के बाद जहां-जहां मुसलमानों का राज्य स्थापित हुआ उन्होंने लौकिक व प्रशासनिक प्रयोजनों के लिए इस्लामी हिजरी सन का प्रचलन किया। हिजरी सं में वर्ष गणना चन्द्र मासो के अनुसार की जाती थी।
1584 में अकबर ने हिजरी वर्ष गणना को बंद कर तारीख इलाही चलाया जिसमें सौर वर्ष गणना थी। तारीख इलाही का प्रचलन भी 1630 के लगभग बंद हो गया और पुनः हिजरी सन का प्रचलन हो गया। 1757 के लगभग अंग्रेजों का भारत में राज्य स्थापित होने के समय से यहां ईसवी सन का तिथिपत्रक, जो ग्रेगरी कलेंडर नाम से था, लौकिक और प्रशासनिक प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने लगा। इसका प्रचार अंग्रेजी शिक्षा के साथ भारत भर में हो गया और भारतवर्ष में इसका इतना प्रचलन हुआ कि यह एक आदत बन गया। यदपि भारत सरकार ने 12 मार्च 1957 को शक संवत को राष्ट्रीय संवत के रूप में अपनाया है। इसका प्रयोग कुछ सीमा तक सरकारी विभागों में ही हुआ है। लेकिन सरकारी विभागों में अभी भी ईसवी सन चलता है और धार्मिक कार्यों में विभिन्न धर्मावलम्बी अपने-अपने धार्मिक तिथि पत्रकों में इसका प्रयोग करते हैं।
राष्ट्रीय सांस्कृतिक गौरव को जगाने की अवश्यकता
ध्यान रहे कि सामाजिक विकृतियों ने भारतीय जीवन में दोष एवं रोग भर दिया, फलतः कमज़ोर राष्ट्र के भू-भाग पर परकीय, परधर्मियों ने आक्रमण कर हमें ग़ुलाम बना दिया। सदियों से हमें शक, हून, कुषाण, अरब, तुर्क, मंगोल, डच, फ्रांसीसी, मुगल, पुर्तगाली, अंग्रेज़ की पराधीनता की पीड़ायें झेलनी पड़ी। पराधीनता के कारण जिस मानसिकता का विकास हुआ इससे हमारे राष्ट्रीय भाव का क्षय हो गया और समाज में व्यक्तिवाद, भय एवं निराशा का संचार होने लगा। हम अपने गौरवशाली परंपरा को विस्मृत करने लगे। जिस समाज में भगवान् श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, महावीर, नानक व अनेक ऋषि – मुनियों का आविर्भाव हुआ। जिस धरा-धाम पर परशुराम, भीष्म, बाल्मीकि, वशिष्ठ एवं चाणक्य जैसे दिव्य पुरुषों का जन्म हुआ। जहाँ परम् प्रतापी महाराज व सम्राटों की श्रृंखला का गौरवशाली इतिहास निर्मित हुआ। वहाँ की गौरवशाली परंपराएं ही हमारा वास्तविक हित कर सकेंगी।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था – “यदि हमें गौरव से जीने का भाव जगाना है, तो हमें अपने अन्तर्मन में राष्ट्र भक्ति के बीज को पल्लवित करना है तो राष्ट्रीय तिथियों का आश्रय लेना होगा। ग़ुलाम बनाए रखने वाले परकीयों की दिनांकों पर आश्रित रहने वाला व्यवहार बदलना होगा। भारतीय तिथियाँ हमारे मन में यह उद्घोष जगाती हैं कि हम धरती माता के पुत्र हैं सूर्य चंद्र व नवग्रह हमारे आधार हैं। प्राणी मात्र हमारे परिवारिक सदस्य हैं तभी हमारी संस्कृति का बोध “वसुधैव कुटुंबकम्” का सार्थक्य सिद्ध होता है”।
श्री गुरुजी वर्षप्रतिपदा पर विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं- “नूतन वर्ष के दिन बहुत से सज्जन आगामी वर्ष में कार्यों की कुछ योजना बनाते हैं, बड़े अच्छे-अच्छे निश्चय किया करते हैं और समझते हैं कि उन निश्चयों को लेकर अपना नया वर्ष बिताएंगे”।
मोरारजी देसाई को जब किसी ने पहली जनवरी को नववर्ष की बधाई दी तो उन्होंने उत्तर दिया था – “किस बात की बधाई दी? मेरे देश और देश के सम्मान का तो इस नववर्ष से कोई सम्बन्ध नहीं”।
यही हम लोगों को भी समझना और समझाना होगा। क्या एक जनवरी के साथ ऐसा एक भी प्रसंग जुड़ा है जिस से राष्ट्र प्रेम जाग सके? आईये हम सब मिलकर विदेशी दासता को छोड़कर, अपने देश की गौरवशाली परंपरा को अपनायें और गर्व के साथ भारतीय नववर्ष को ही मनायें। इस दिन एक दूसरे को बधाई देकर अधिक से अधिक प्रचार करें। अपनी महान् एवं सनातन संस्कृति से जुड़े नववर्ष की ओर भी हमारा भाव, समर्पण बना रहना चाहिए। हमारी नयी पीढ़ी को अपनी प्राचीन एवं अतुलनीय संस्कृति को सम्भालना एवं ससम्मान इसका प्रचार भी करना होगा। क्योंकि हमारी संस्कृति “बहुजन हिताय बहुजन सुखाय” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की बात करती है। नववर्ष चैत्र प्रतिपदा का दिन हिंदू मन, ह्रदय और विवेक को भारत के इतिहास के घटनाचक्र, राष्ट्र की अस्मिता, सांस्कृतिक परंपराओं एवं वीर गाथा तथा वैभवशाली पूर्वजों की विरासत का यशस्वी बोध कराता है।
हिन्दू नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रमी संवत् 2,083 (19 मार्च 2,026) दिन गुरुवार को करणीय बातें:
- स्नान करने के पश्चात पीला या भगवा वस्त्र पहनें।
- मस्तिष्क पर उस दिन तिलक अवश्य लगायें।
- पुजा व हवन कराकर घर पर मिष्ठान्न बनायें ।
- प्ररेणा देना वाला धार्मिक व ऐतिहासिक स्थान का विहार करें।।
- घर की छत पर भगवा झंडा अवश्य लगायें।
- रात्रि को घर पर दीप अवश्य जलायें।
- घर के द्वार को सजाएँ, रंगोली बनाएँ, फूल और पत्तों के तोरण लगाएँ।
- इस दिन नीम की पत्तियों और मिश्री का सेवन करें, जो आयुर्वेद के अनुसार मौसमी बदलावों से शरीर की रक्षा करता है।
- कम से कम 11 लोगों को मिलकर या फोन कॉल पर नववर्ष की शुभकामनाएँ देवें और उन्हें भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करें ये बातें स्मरण कराएं।




