वक़्त, सब्र और मुक़ाम

अमरदीप जौली

स्कूल के वो लकड़ी के बेंच और बचपन का वो मासूम दौर आज भी यादों में ताज़ा है। आधी छुट्टी (इंटरवल) के समय जब कोई सहपाठी गर्व से सीना चौड़ा करके कहता, “पता है, मैं कल चाचा बन गया!” या कोई लड़की मुस्कुरा कर बताती, “मैं तो बुआ बन गई या मौसी बन गई,” तो पूरी क्लास उसे ऐसे देखती मानो उसने कोई बड़ा मेडल जीत लिया हो।​उस शोर-शराबे के बीच क्लास के एक कोने में बैठे मन के अंदर एक अजीब सी ख़ामोशी छा जाती थी। दिल में एक मासूम सा सवाल उठता, “यार, हम तो कुछ भी नहीं बने।” ऐसा लगता था जैसे बाकी सब किसी ख़ास मुक़ाम पर पहुँच गए हों और हम दौड़ में पीछे छूट गए हों।​पर उम्र के बढ़ने के साथ ज़िंदगी ने एक ख़ूबसूरत सच सिखाया। वो रिश्ते किसी की मेहनत या मुक़ाबले का नतीजा नहीं थे, बल्कि परिवार के स्वाभाविक चक्र का हिस्सा थे। बड़े भाई-बहनों की शादी और वक़्त की चाल ने उन्हें वह रूप दिया था।​ज़िंदगी के हर पड़ाव पर अक्सर यही अहसास फिर सामने आता है। जब हम दूसरों को कामयाब होते, नए मुक़ाम छूते या आगे बढ़ते देखते हैं, तो मन अक्सर बचपन के उसी कोने में खड़े होकर सोचने लगता है कि “मैं अभी कुछ नहीं बना।”​पर कुदरत का अपना क़ानून है। बीज ज़मीन में पड़ते ही पेड़ नहीं बन जाता; उसे धूप, पानी, हवा और सबसे बढ़कर वक़्त की ज़रूरत होती है। आपके आस-पास का माहौल, आपके रोज़ाना के नेक कर्म और आपका सब्र आपकी ज़िंदगी की ज़मीन तैयार करते हैं।​दूसरों की घड़ी देखकर अपनी रफ़्तार का फ़ैसला न करें। जब आपका समय आएगा, कुदरत सारे हालात अपने-आप अनुकूल बना देगी, और आप वही बनेंगे जो बनने के लिए आपका सफ़र तय हुआ है।​

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